दोस्तों की हौसला अफजाई से मुकम्मल हुआ रोजा

मेरी उम्र कोई 10 साल की होगी, जब मैंने पहला रोजा रखा था। वालिदा ने बहुत समझा-बुझाकर मुझे रोजा रखने के लिए तैयार किया था। मैं भूख का कच्चा था, मैंने रोजा रखने के बाद दिनभर दोस्तों के साथ खेलकूद कर वक्त काटा था। उस मेरे रोजे की निगरानी मेरे दोस्तों नहीं की थी। पहले रोजे का यह तजुर्बा है वरिष्ठ अधिवक्ता यावर खान का है। यावर हाल ही में उस वक्त सुर्खियों में आए हैं जब उनकी एक याचिका पर पुलिस और जेल के अधिकारियों सहित एक डॉक्टर पर हत्या की साजिश रचने का मामला दर्ज किया गया है यह आदेश कोर्ट ने दिया है। जेल में बंदी की मौत के मामले में यावर खान ने याचिका की थी। इसके अलावा मुलताई गोलीकांड में भी यावर ने इंदौर हाई कोर्ट में पीआईएल लगा रखी है। यावर बहुचर्चित शहला मसूद हत्याकांड के आरोपियों के भी वकील हैं। इसके अलावा कई उन्होंने जनहित याचिकाएं भी लगा रखी हैं। पहले रोजे के बारे में यावर बताते हैं कि हम उन दिनों सीहोर जिले के बुधनी तहसील में रहते थे। हमारी पढ़ाइ-लिखाई वहीं पर हुई है, मेरे अधिकांश दोस्त हिंदू भाई थे। जिस दिन मैंने अपना पहला रोजा रखा उस दिन सभी दोस्त मेरे साथ थे, मैं रोजा ना तोड़ दूं। इसलिए सबने मेरी निगरानी की थी। वालदा ने मुझे समझा-बुझाकर रोजा तो रखवा दिया था, लेकिन मैं भूखा का कच्चा था। लिहाजा मेरे दोस्तों ने खेलने के दौरान मुझ पर पूरी नजर रखी कहीं में रोजा ना तोड़ दूं। मैं अक्सर अपने पहले रोजे को याद कर मुस्कुराता हूं। क्योंकि उस दिन भूख और प्यास की वजह से दिन को काटना मुश्किल था।
(जैसा कि शहर के वरिष्ठ अधिवक्ता यावर खान ने सनव्वर शफी को बताया )


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