शिवराज के नेतृत्व में क्या संवेदना विहीन और रिक्त होती जा रही है भाजपा?

सही है कि आज के आम जनजीवन में संबंधों में वह आत्मीयता और प्रगाढ़ता नहीं रही जो इस देश की सबसे बड़ी विशेषता मानी जाती थी। राजनीति में तो यह पूरी तरह से विलुप्त हो चुकी है। राजनीति में आज संबंधों में कितनी औपचारिकता और दिखावा रह गया है इसका प्रमाण कल मुझे मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में देखने को मिला। अवसर था केंद्रीय मंत्री और मध्यप्रदेश की दबंग नेत्री व पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमाभारती के बड़े भाई स्व. स्वामी प्रसाद लोधी के अंतिम संस्कार का। एक औसत भारतीय के अनुसार 72 वर्षीय श्री लोधी ने अपने जीवनकाल में समाज सेवा के साथ राजनीति में कई आयाम रचे थे, परंतु उनकी सबसे बड़ी देन साध्वी सुश्री उमाभारती ही हैं। सुश्री भारती ने उनके मार्गदर्शन और संरक्षण में भारतीय राजनीति को एक नया आयाम दिया और आज भी लगातार संघर्षरत हैं। एक अत्यंत निर्धन व सामान्य परिवार से आने वाले स्व. स्वामी लोधी और उनकी बहन सुश्री उमाभारती ने अपनी मेहनत और संघर्ष से ही एक ऐसा मुकाम प्राप्त किया जो आज मध्यप्रदेश की राजनीति में अमिट छाप है। स्व. श्री लोधी के कुशल मार्गदर्शन के कारण ही देश को उमा भारती के रूप में एक ऐसा राजनेता प्राप्त हुआ है, जिसमें संघर्ष के साथ आगे बढऩे और किसी भी विकट परिस्थिति से उबरने की जुझारू प्रवृत्ति है। सुश्री उमाभारती के चेहरे पर जो तेज व वाणी में जो ओज है वह उनके भाषणों में पूरी तरह झलकता है। उनको अग्निमुखी (फायर ब्रांड) नेता तक की संज्ञा दी गई है। मध्यप्रदेश की राजनीति में भाजपा को एक पुख्ता आधार देने में भाजपा के पितृ पुरुष कुशाभाऊ ठाकरे के बाद सुश्री उमाभारती की ही सबसे बड़ी भूमिका है, क्योंकि उन्होंने भाजपा की एक समर्पित कार्यकता के साथ-साथ मुख्यमंत्री के रूप में जैसा काम किया, उसने उनकी छवि को और अधिक उज्ज्वल ही किया है। अपने बड़े भाई के महाप्रयाण पर उमाभारती कितनी व्यथित और संताप में डूबी हुई थीं, इसका प्रमाण कल उनसे आपसी बातचीत में उनके उन कथनों से झलक रहा था जिनमें उन्होंने बताया कि स्व. श्री लोधी उनके जीवन में कितना बड़ा स्थान रखते थे। स्पष्ट है कि बुंदेलखंड के लिए स्व. श्री लोधी का अवसान एक बड़ी क्षति है और इसका प्रमाण उनके अंतिम संस्कार के समय मिला। टीकमगढ़ में उनके अंतिम संस्कार के लिए हजारों लोग उमड़े थे। मध्यप्रदेश के कई दिग्गज नेताओं, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों के साथ ही उत्तरप्रदेश के भी अनेक विधायक व कार्यकर्ता नजर आए। टीकमगढ़ स्थित दिव्यान्तरण फार्म हाउस में जब राजकीय सम्मान के साथ स्व. श्री लोधी को अंतिम विदाई दी जा रही थी तब सभी की आंखों में आंसू व चेहरे पर दुख के भाव थे। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भाजपा प्रदेशाध्यक्ष राकेश सिंह और प्रभात झा के साथ अन्त्येष्टि स्थल पर पहुंचकर हजारों की भीड़ में कुछ संख्या जरूर बढ़ाई। लेकिन टीकमगढ़ की जनता का जो भाव था उसमें वे सफल नहीं हुए। वहां उपस्थित लोगों के चेहरे पर संताप था और वे अपने लाड़ले नेता स्व. श्री स्वामी लोधी के लिए मुख्यमंत्री के मुख से ऐसा कोई शब्द सुनना चाहते थे जिससे उनकी भावना का सम्मान हो। लेकिन अंत में लोग यह कहते हुए निकले कि मुख्यमंत्री श्री चौहान ने यहां आकर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं किया। श्री लोधी की विदाई राजकीय सम्मान से करना तात्कालिक रही। लेकिन उनके नाम को अमर और अजर करने के लिए जो कदम मुख्यमंत्री को उठाना था या जो घोषणा उन्हें करनी थी, जब वह उनके मुख से किसी ने नहीं सुनीं तो क्षेत्र के लोगों को बड़ा आघात लगा। लोगों को यह अपेक्षा थी कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दुख के इन क्षणों में ऐसा कुछ जरूर कहेंगे जिससे न केवल सुश्री उमाभारती अपितु बुंदेलखंड के सारे लोगों को यह अनुभूति हो कि वास्तव में इस पिछड़े क्षेत्र के एक बड़े व्यक्ति के जाने से वह दुखी हैं। यह भी अपेक्षा थी कि वह इस अवसर पर ऐसा कुछ करेंगे जिससे लगे कि इस क्षेत्र के लिए स्व. श्री लोधी ने जो सेवाएं दी हैं, उसके लिए उन्हें सदा याद रखा जाएगा। आम लोगों की अपेक्षा तो यह थी कि मुख्यमंत्री श्री चौहान इस अवसर पर स्व. श्री स्वामी प्रसाद लोधी की स्मृति को बनाए रखने के लिए किसी कार्यक्रम या योजना की घोषणा कर देते। इतना भी नहीं तो कम से कम वह टीकमगढ़ की एकाध सड़क या किसी चौराहे अथवा भवन का नाम ही श्री लोधी की स्मृति में करने की घोषणा कर देते या फिर उस स्कूल का ही नाम स्व. श्री लोधी के नाम से कर देते जिसमें पढ़कर उन्होंने टॉप किया। अगर मुख्यमंत्री श्री चौहान कुछ इस तरह की घोषणा कल कर देते तो निश्चित रूप से यही संदेश जाता कि वह टीकमगढ़ केवल राजनीति के तकाजों के लिए या आगामी चुनावों के मद्देनजर नहीं गए थे। कल राजकीय सम्मान और बड़ी-बड़ी बातें तो श्रद्धांजलि मंच से हुईं लेकिन एक बार फिर लगा कि शायद शिवराज के नेतृत्व में भाजपा आज किस कदर संवेदना विहीन और रिक्त हो चुकी है। भाजपा मध्यप्रदेश में आज कितनी संवेदनहीन हो चुकी है, इसका प्रमाण कल टीकमगढ़ में देखने को मिला।


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