प्रोत्साहन और सख्ती के बावजूद दलील में कमजोर हैं सरकारी वकील

प्रशासनिक संवाददाता ॥ भोपाल
मध्यप्रदेश में सरकारी वकीलों की कमजोर दलीलों का लाभ अपराधियों और आरोपियों को मिल रहा है। पीडि़तों का पक्ष सही तरीके से कोर्ट में नहीं रख पाने के कारण बड़ संख्या में आरोपी बरी हो रहे हैं। हालांकि अभियोजन अधिकारियों की सुस्ती को दूर करने के लिए प्रोत्साहन योजना लागू की गई है लेकिन इस योजना में कुछेक मामलों में सक्रियता दिखाने के अलावा इन अधिकारियों के खाते में ज्यादा कुछ नहीं है।
अभियोजन अधिकारियों के कामकाज की मॉनीटरिंग के लिए ई-प्रोसीक्यूशन नाम का एप भी तैयार किया गया है, जिस पर रोजाना जानकारी अपडेट की जाती है। अभियोजन अधिकारियों को सौंपे गए प्रकरणों में सजा के आधार पर इन्हें नंबर दिए जाते हैं। हाल ही में 13 जिलों के अभियोजन अधिकारियों को खराब परफारर्मेंस के कारण नोटिस भी जारी किए गए हैं। प्रदेश की अदालतों में लंबित मामलों और अभियोजन की कार्यवाही के आंकड़े बताते हैं कि हर दस में से आठ मामलों में आरोपी का दोष साबित ही नहीं हो पा रहा। केवल 20 प्रतिशत मामलों में ही आरोपियों को सजा मिल पा रही है। कोर्ट के निर्णयों में भी यह लिखी जा रही है कि अभियोजन आरोप सिद्ध नहीं करा पा रहा। ऐसी स्थिति में पुलिस की इन्वेस्टिगेशन और वकीलों की काबिलियत दोनों शक के दायरे में है।
अभियोजन अधिकारियों का इस मामले में तर्क है कि वे उन्हीं तथ्यों को कोर्ट में रखते हैं जो पुलिस की जांच और केस डायरी में सामने आए हैं। गवाह अभियोजन के पक्ष में बयान दें इसके प्रयास भी किए जाते हैं, बावजूद इसके गवाह पलट जाते हैं। ऐसे में सरकारी वकील चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते जबकि पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पुलिस अपराधियों तक पहुंचने से लेकर तथ्य जुटाने तक पूरी मेहनत करती है। कोर्ट में उन्हें सजा दिलवाने के लिए भी प्रयास होता है, लेकिन कई बार गवाह पलट जाते हैं।
एक जिले की बानगी
इंदौर जिले में जुलाई 2017 से अगस्त 2018 तक के आंकड़े बताते हैं कि इस दौरान जिला कोर्ट में 552 केसों में फैसला हुआ। इनमें से 108 में ही सजा हुई, बाकी 444 केसों में अपराध ही सिद्ध नहीं हो पाया। इन 552 में से 430 की सुनवाई सेशन कोर्ट में हुई, जबकि जेएमएफसी कोर्ट में 122 में फैसला आया। जेएमएफसी कोर्ट में सरकार की सफलता का प्रतिशत 21 तो सेशन कोर्ट में महज 19 है।
यह है आंकड़ों की कहानी
दुष्कर्म के मामलों में तो हालत बद से बदतर है। इंदौर जिले में दुष्कर्म के 148 मामलों में कोर्ट ने फैसला सुनाया। इनमें से 138 में आरोपित बरी हो गए। जेएमएफसी कोर्ट में चलने वाली छोटी धाराओं के अपराधों का भी यही हाल है। अदालतों ने 46 मामलों में फैसला सुनाया। इनमें से 42 में आरोपित बरी हुए।


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