उद्योगों ने नहीं दिखाई विकास में दिलचस्पी

प्रशासनिक संवाददाता ॥ भोपाल
मप्र में गांवों के विकास के लिए कार्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) से फंड जुटाने की राज्य सरकार की बात कागजी साबित हुई है। न तो सीएसआर की पॉलिसी बनी और न ही मप्र में करोड़ों का कारोबार करने वाली कंपनियों के सीएसआर पर निगरानी का कोई तंत्र बन पाया।
हालांकि प्रदेश के वाणिज्य एवं उद्योग विभाग ने अक्टूबर 2017 में सीएसआर के लिए फेलिसिटेशन निर्देश जारी किए थे लेकिन इन पर प्रभावी अमल नहीं हो पा रहा। यही वजह है कि मप्र में पिछले तीन सालों के दौरान कार्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत खर्चहोने वाली राशि दूसरे राज्यों की तुलना में बेहद कम है। पिछले वित्तीय वर्ष में कंपनियों ने अपने सीएसआर मद से मप्र में केवल 213 करोड़ रूपए खर्च किए जबकि कंपनियां यहां हजारों करोड़ का कारोबार कर रही हैं। राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष चेतन्य कश्यप देश की पहली सीएसआर पॉलिसी सबसे पहले मप्र में बनाना चाहते थे लेकिन उनका यह प्रयास पूरा नहीं हुआ। योजना आयोग ने इसकी पहल तो की लेकिन इस काम को पूरा नहीं कर पाया। कश्यप ने कहा था कि सरकार निजी कंपनियों की मदद से प्रदेश के ग्रामीण विकास में जुटी प्रदेश सरकार अब निजी कंपनियों के लिए सीएसआर पॉलिस लागू करने जा रही है। सीएसआर पॉलिसी लागू होने पर मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य बन जाएगा। सितंबर 2017 में अनुमान लगाया गया था कि सीएसआर पॉलिसी बनने से निजी कंपनियां प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 700 करोड़ रूपए के काम करवाएंगी। राज्य सरकार इस नीति की मदद से निजी कंपनियों के सीएसआर की दिशा तय करना चाहती थी कि उन्हें किस क्षेत्र में काम करना है।
शुद्ध लाभ का दो फीसदी
कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 135 के तहत बड़ी कंपनियों को अपने कुल प्रॉफिट का दो फीसदी हिस्सा सामाजिक कार्यों के लिए खर्च करना होता है। योजना आयोग चाहता था कि इस पॉलिसी के तहत आदिवासी और ग्रामीण अंचलों में कार्य कराए जाएं। प्रस्तावित पॉलिसी को लेकर कहा जा रहा था कि इससे ना केवल प्रदेश सरकार को, निजी कंपनियों के एक्सपर्ट्स का सपोर्ट मिलेगा, बल्कि ग्रामीण अंचलों में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में भी मदद मिलेगी।
ट्रायफेक पर जिम्मेदारी
उद्योग विभाग ने 13 अक्टूबर 2017 को सीएसआर के संबंध में विस्तृत निर्देश जारी किए थे। उद्योग विभाग की संस्था ट्रायफेक को इस काम की जिम्मेदारी सौंपी गई थी कि वह कंपनियों के बीच समन्वय कर सीएसआर की राशि की व्यवस्था करेगा। इसके लिए ट्रायफेक में सीएसआर सेल बनाया गया था।
ऐसे होने थे सीएसआर में काम
सीएसआर के लिए अलग से वेबसाइट बनाने की बात भी निर्देश में कहीं गई थी जिस पर विभागवार और जिलावार शेल्प ऑफ प्रोजेक्ट प्रदर्शित होने थे, लेकिन अब तक यह वेबसाइट नहीं बनी। निर्देशों में कहा गया था कि विभागों द्वारा तैयार किए जाने वाले प्रोजेक्ट कम से कम एक लाख रूपए के होना चाहिए। सभी संबंधित विभाग उनके शेल्फ ऑफ प्रोजेक्ट्स की जानकारी ट्रायफेक की सीएसआर सेल को देंगे। कंपनी इन शेल्फ ऑफ प्रोजेक्ट्स में से उसकी इच्छानुसार प्रोजेक्ट्स का चयन करेगी। यह निर्देश प्राईवेट कंपनियों के साथ-साथ सरकार के पीएसयू पर भी लागू हैं।


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