लगातार दूसरे साल आज मिले दस नेशनल अवार्ड

विशेष संवाददाता ॥ भोपाल
पर्यटन मंत्रालय भारत सरकार द्वारा आज नई दिल्ली में घोषित नेशनल अवार्डस में मध्य प्रदेश पर्यटन को 10 अवार्ड प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त लगातार तीन साल से बेस्ट टूरिज्म स्टेट के रूप में हॉल ऑफ फेम का नेशनल अवार्ड भी दूसरे साल भी प्रभावशील है। यह अवार्ड लगातार तीन साल तक प्रभावी रहेगा। अवसर था विश्व पर्यटन दिवस के मौके पर नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में आयोजित समारोह का। समारोह में केन्द्रीय पर्यटन राज्यमंत्री केजे अल्फोन्स ने यह अवार्ड प्रदान किये। मध्यप्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति राज्यमंत्री सुरेन्द्र पटवा, पर्यटन निगम के अध्यक्ष तपन भौमिक, प्रमुख सचिव, पर्यटन एवं टूरिज्म बोर्ड के एमडी हरिरंजन राव, पर्यटन निगम के एमडी टी इलैया राजा एवं टूरिज्म बोर्ड की अपर प्रबंध संचालक भावना वालिम्बेग आदि मौजूद थे।
इन पुरस्कारों से नवाजा : पर्यटन मंत्रालय भारत सरकार द्वारा विश्व पर्यटन दिवस पर घोषित अवार्डस में मध्यप्रदेश को बेस्ट हेरीटेज सिटी का सिटी ऑफ जॉय माण्डू को, बेस्ट एडवेंचर स्टेरट का मध्यप्रदेश और उत्तराखण्ड को संयुक्त रूप से, एक्सी लेन्स एन पब्लिसिंग इन इंगलिश लेंगवेज में कॉफी टेबल बुक कान्हा टाईगर रिजर्व को स्वच्छता का नेशनल अवार्ड इन्दौर को, बेस्टल सिविक मैनेजमेंट का ओंकारेश्वर को, वेस्टो वाइल्डस लाइफ गाइड का पन्ना नेशनल पार्क के गाइड राशिका प्रसाद को, वेस्ट एयरपोर्ट के रूप में देवी अहिल्या बाई होलकर एयरपोर्ट इन्दौर को और बेस्टा हेरीटेज प्रोपर्टी का देवबाघ ग्वालियर को नेश्नअल अवार्ड मिला है।

चीफ जस्टिस और जस्टिस खानविलकर ने कहा कि एडल्टरी किसी तरह का अपराध नहीं है, लेकिन अगर इस वजह से आपका पार्टनर खुदकुशी कर लेता है, तो फिर उसे खुदकुशी के लिए उकसाने का मामला माना जा सकता है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस खानविलकर ने धारा 497 को असंवैधानिक करार दिया।जस्टिस नरीमन ने भी चीफ जस्टिस और जस्टिस खानविलकर के फैसले को सही ठहराया है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने भी अन्य जजों के फैसले को सही ठहराते हुए एडल्टरी को अपराध नहीं माना है।इस मामले में केंद्र सरकार अपना हलफनामा दायर कर चुकी है। व्यभिचार कानून के तहत यह धारा हमेशा से विवादों में रही है और इसे स्त्री-पुरुष समानता की भावना के प्रतिकूल बताया जाता है। चीफ जस्टिस ने कहा कि एडल्टरी तलाक लेने का आधार बन सकता है, लेकिन ये कोई अपराध नहीं हो सकता है। आईपीसी की धारा-497 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कानून का समर्थन किया है। सुनवाई में केंद्र सरकार की ओर से एएसजी पिंकी आंनद ने कहा था कि अपने समाज में हो रहे विकास और बदलाव को लेकर कानून को देखना चाहिए न कि पश्चिमी समाज के नजरिए से।इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा था कि सरकार की यह दलील कि विवाह की पवित्रता बनाए रखने के लिए व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में होना ही चाहिए, यह उचित नहीं लगता। यह कैसा कानून है कि अगर शादीशुदा पुरुष अविवाहित महिला के साथ संबंध बनाता है तो कोई अपराध नहीं बनता। पीठ ने कहा कि विवाहित महिला अगर किसी विवाहित पुरुष से संबंध बनाती है तो सिर्फ पुरुष ही दोषी क्यों? जबकि महिला भी अपराध की बराबर जिम्मेदार है।
-महिला के पक्ष में खड़ा कोर्ट?
आज के फैसले से साफ हो गया कि कोर्ट ने समानता के अधिकार को सर्वोपरि मानते हुए महिलाओं के अधिकार को सर्वोपरि माना।सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने एकमत से फैसला सुनाया कि व्यभिचार कानून अपराध नहीं है।बीते 2 अगस्त को देश की शीर्ष अदालत में इस मामले पर सुनवाई थी। तब अदालत ने कहा था, व्यभिचार कानून महिलाओं का पक्षधर लगता है लेकिन असल में यह महिला विरोधी है। पति के कहने पर पत्नी किसी की इच्छा की पूर्ति कर सकती है, तो इसे भारतीय नैतिकता कतई नहीं मान सकते।अदालत ने आगे कहा, शादीशुदा संबंध में पति-पत्नी दोनों की एक बराबर जिम्मेदारी है। फिर अकेली पत्नी पति से ज्यादा क्यों सहे? यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट इस कानून को पुरातन मान रही है।सुप्रीम कोर्ट में अब तक की सुनवाई से साफ है कि अदालती जिरह मुख्य रूप से समानता और गैर-समानता के आसपास चली। तभी कोर्ट ने दलील दी कि व्यभिचार पर दंडात्मक प्रावधान संविधान के तहत समानता के अधिकार का परोक्ष रूप से उल्लंघन है क्योंकि यह विवाहित पुरुष और विवाहित महिलाओं से अलग-अलग बर्ताव करता है।
जैसा कि सुप्रीम कोर्ट पूर्व में कह चुका है कि व्यभिचार कानून लगता तो महिला समर्थक है लेकिन है महिलाओं के विरुद्ध। इस तर्क से साफ है कि फैसले का आधार पुरुष-महिला के बीच समानता के अधिकार की ओर इशारा करता है। जबकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में कुछ साल पहले एक अर्जी दाखिल कर कहा गया था कि ये संविधान के अनुच्छेद-14 यानी समानता की भावना के खिलाफ है। अगर किसी अपराध के लिए मर्द के खिलाफ केस दर्ज हो सकता है, तो फिर महिला के खिलाफ क्यों नहीं?
इस अर्जी को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। कोर्ट ने महिला को कमजोर पक्ष माना और कहा था कि ऐसे में उनके खिलाफ केस नहीं चलाया जा सकता। हालांकि कोर्ट की दलीलों से यह स्पष्ट नहीं हो सका कि जब केस मर्द के खिलाफ दर्ज होगा, तो महिला को कमजोर पक्ष कैसे मान सकते हैं।
इस कानून का एक पक्ष यह भी है कि अपराधी सिर्फ पुरुष’ हो सकते हैं और महिला सिर्फ शिकार क्योंकि केवल उस व्यक्ति के खिलाफ केस दर्ज का प्रावधान है, जिसने शादीशुदा महिला के साथ संबंध बनाए। उस महिला के खिलाफ मुकदमा नहीं होता, जिसने ऐसे संबंध बनाने के लिए सहमति दी। फिर एक सवाल यह उठता है कि जब महिला को हर प्रकार से छूट दी गई है तो तो उसे ‘शिकार’ कैसे माना जा सकता है।


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