13 साल में शिव-राज नहीं दे पाया सहरिया आदिवासियों को अच्छा खाना और रोजगार

डॉ. अनिल सिरवैया ॥ भोपाल
मध्यप्रदेश की जनजातियों की स्थिति प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के उस बड़बोलेपन पर करारा तमाचा है जिसमें वह मप्र को विकसित राज्य बताने पर तुले हुए हैं। बकौल शिवराज मप्र बीमारू से विकसित हो चुका है और चौथी बार सरकार आने वे इसे समृद्ध राज्य बनाएंगे। उनके इस दावे और वादे के बीच भुखमरी और कुपोषण के बीच जीने को मजबूर प्रदेश के सहरिया आदिवासियों की स्थिति सरकार के झूठ का पर्दाफाश करती है।
हाल ही में राज्य सरकार की एक संस्था अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन एवं नीति विश्लेषण संस्थान ने प्रदेश में सहरिया आदिवासियों पर एक अध्ययन किया है। इस अध्ययन में जो तस्वीर उभरकर सामने आई है, वह शिवराज से लेकर पीएम मोदी तक को आईना दिखाने के लिए काफी है। 2003 और 2018 के आंकड़ों को पेश कर भ्रमजाल बुन रही सरकार के पास बस इसी बात के आंकड़े नहीं हैं, कि उसके 13 साल के शासन में आदिवासियों और खासकर सहरिया आदिवासियों के जीवन में क्या बदलाव आया। ऐसा इसलिए भी, क्योंकि अपनी कलई खुलने के डर से सरकार ऐसा कोई अध्ययन या रिपोर्ट (शेष पेज 13 पर)
13 साल में शिव-राज नहीं दे पाया…
तैयार नहीं करा पाई जिसमें आदिवासियों का विकास दिखाई देता हो।
सहरिया जनजाति पर अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन एवं नीति विश्लेषण संस्थान की अध्ययन रिपोर्टबताती है कि अन्य कुपोषित बच्चों की तुलना में सहरिया बच्चों में दोगुना कुपोषण है जिसके पीछे वजह उनकी बदतर आर्थिक हालात है। सहरियाओं की इस दुर्गति के पीछे कारण यह भी है कि अपनी इमेज बिल्डिंग के लिए मिल-बांचे जैसे कार्यक्रमों में बच्चों को पढ़ाने वाले मुख्यमंत्री के राज में इन 73 प्रतिशत सहरिया अशिक्षित हैं। प्रदेश में हरेक व्यक्ति को भूमि स्वामी बनाने का दावा करने वाली सरकार में आदिवासियों के लिए वनाधिकार पट्टा अधिनियम लागू होने बाद भी केवल 39 प्रतिशत सहरिया समुदाय के पास ही जमीन का कोईटुकड़ा है। इस अध्ययन के प्रमुख निष्कर्षों के मुताबिक शिवपुरी में काम के लिए पलायन करने वालों में 56 प्रतिशत लोग सहरिया जनजाति के हैं।
इन बीमारियों की चपेट में सहरिया बच्चे
अध्ययन के अनुसार एक वर्षकी अवधि में बुखार, दस्त और सामान्य ठंड जैसी बीमारियां इन्हें ज्यादा जकड़ती हैं। सहरिया समुदाय के 8 6 प्रतिशत बच्चे को उल्टी और दस्त की बीमारी होती है। 76 प्रतिशत बच्चों को बुखार की बीमारी ज्यादा आती है।
ये थी प्रमुख सिफारिश
जनजातीय क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों को बढ़ाने के लिए काम किया जाए। इस अध्ययन में सामने आया है कि रोजगार के पर्याप्त अवसर और पर्याप्त मजदूरी नहीं मिलने का नकारात्मक असर इनके पूरे जीवन पर है।

प्रमुख तथ्य
– 2016 में भारत सरकार ने मप्र की तीन जनजातियों बैगा, भारिया और सहरिया को विशेष पिछड़ी जनजाति घोषित किया था।
– राज्य सरकार ने पिछले 14 साल में अनुसूचित जनजाति वर्ग की आर्थिक और सामाजिक स्थिति सुधारने 78 2 फीसदी बजट बढ़ाया है, लेकिन स्थिति में अपेक्षाकृत सुधार नहीं हुआ।
– इस जनजाति पर सरकार का सारा लाड़-प्यार सिर्फ कोलारस और मुंगावली उपचुनाव के समय बरसा। इस उपचुनाव के समय सरकार को इस जनजाति की याद आई और तभी से लगातार कुछ न कुछ दिया गया।
– सहरिया जनजाति को कुपोषण दूर करने के लिए हर महीने एक हजार रूपए दिए जाते हैं।
– जनजाति के लोग पत्थरों की खदानों व अन्य जगह पर मजदूरी कर रहे हैं। उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है।
– उन्हें सरकारी नौकरियों में उन्हें जगह नहीं मिल रही है।
मप्र के विकास को गिनाने वाले शाह ने भी साधी चुप्पी
इसी साल फरवरी में हुए मुंगावली और कोलारस में विधानसभा उपचुनाव के दौरान यही सहरिया सरकार की आंख के तारे बन गए थे, क्योंकि यहां मतदाताओं में इनकी संख्या निर्णायक है। दोनों उपचुनाव हारने के बाद यही आंख के तारे दिन के तारे बन गए जो सरकार को अब दिखाईनहीं दे रहे। अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ श्योपुर के पड़ोसी जिले गुना और शिवपुरी में रोड शो करने पहुंचे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित भाजपा के तमाम नेताओं ने यहां खूब सारी बातें कीं लेकिन सहरिया आदिवासियों को दुर्गति से निकालने पर कुछ नहीं बोल पाए।


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