ग्रहों की स्थिति से जानें हृदय रोग का कारण और उपचार

सच प्रतिनिधि ॥ भोपाल
जब से मानव जीवन की शुरूआत हुई, तभी से रोगों का भी इतिहास रहा। रोगों से बचाव के लिए मानव ने बचाव प्रारंभ कर दिया था, जो अभी तक जारी है। मनुष्य जितना प्राकृतिक रहस्यों को खोजने की कोशिश करता है, प्रकृति उतना ही भयावह रूप धारण कर लेती है। हमारे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद से रोगों का परिज्ञान आरम्भ हो जाता है। जिसमें हृदय रोग, उदर रोग व नेत्र रोगों की चर्चा है, साथ ही इनके उपचार के लिए औषधि, मंत्र इत्यादि भी उपलब्ध हैं। ज्योषिशास्त्र के अनुसार ग्रहों की स्थिति व राशियों के साथ उनके संबंधों से गणना कर रोगों की जानकारी प्राप्त हो जाती है तथा रोगों के उपचार भी उपलब्ध हो सकते हैं। यदि गणना सटीक हो तो इसी शास्त्र में रोगों की उत्पत्ति का मूल कारण कर्म है। इन्हीं के अनुसार ग्रह-राशियों की स्थिति जातक को फल प्रदान करती है। ग्रहों की प्रकृति, धातु, रस, अंग, अवयव, स्थान बल व अन्य विशेषताओं के आधार पर रोगों का निश्चय कर उनके निदान के उपाय भी बताये जा सकते हंै। मनुष्य का हृदय सुकोमल होता है, सतत गतिमान होकर समस्त शरीर का पोषण करता है। हृदय रोग का इतिहास भी प्राचीन है।
ये ग्रह योग बनते हैं हृदय रोग कारण
ठ्ठ चंद्रमा यदि शत्रु गृही हो
ठ्ठ शुक्र यदि मकर राशि में हो
ठ्ठ सूर्य की उपस्थिति चतुर्थ भाव में हो
ठ्ठ तृतीयेश की केतु के साथ युति
ठ्ठ मकर राशि का सूर्य सामान्यत: हृदय रोग देता है।
ठ्ठ तृतीयेश यदि राहु-केतु से युक्त हो तो हृदय घात होता है।
ठ्ठ चतुर्थ भाव में यदि मंगल, शनि व गुरू हो तो भी ऐसी स्थिति बनती है।
हृदय रोग के कुछ उपाय
ठ्ठ शनि यदि कारक हो तो वैदिक मंत्रों का जाप कराना चाहिए।
ठ्ठ राहु यदि उत्तरदायी है तो बीज मंत्र का जाप कराना चाहिए, साथ ही बटुक भैरव का पूजन करें।
ठ्ठ ललिता स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए।
ठ्ठ आदित्य हृदय स्तोत्र का नियमित पाठ करें।


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