काम, क्रोध और अहंकार से मुक्ति दिलाता है स्कंद षष्ठी का व्रत

यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र स्कंद को समर्पित होने के कारण स्कंद षष्ठी के नाम से जाना जाता है। जैसे गणेश जी के लिए महीने की चतुर्थी के दिन पूजा-अर्चना की जाती है उसी प्रकार उनके बड़े भाई कार्तिकेय या स्कंद के लिए महीने की षष्ठी के लिए उपवास किया जाता है।
उत्तर भारत में कार्तिकेय को गणेश का बड़ा भाई माना जाता है लेकिन दक्षिण भारत में कार्तिकेय गणेश जी के छोटे भाई माने जाते हैं। इसलिए हर महीने की षष्ठी को स्कंद षष्ठी मनायी जाती है। षष्ठी तिथि कार्तिकेय जी की होने के कारण इसे कौमारिकी भी कहा जाता है। दक्षिण भारत के साथ उत्तर भारत में भी यह पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है। संतान के कष्टों को कम करने और अपने आस-पास की नकारत्मक ऊर्जा की समाप्ति में यह व्रत फायदेमंद होता है। आज 12 मार्च मंगलवार को स्कंद षष्ठी है।
क्या है स्कंद षष्ठी
तमिल हिन्दुओं के प्रसिद्ध देवता हैं स्कन्द। ये भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र और गणेश जी के छोटे भाई हैं। इनके अन्य नाम मुरुगन, कार्तिकेय और सुब्रहमन्य भी हैं। प्रत्येक मास में दो षष्ठी होती हैं पर परंतु साल में तीन बार इनका सर्वाधिक महत्व होता है। पहला चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी को स्कन्द षष्ठी कहा है, फिर कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि, और आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को, परंतु इस बार इस तिथि का महत्व माघ मास में भी अत्यंत शुभ हो गया है। इसकी वजह है इसका बसंत पंचमी के साथ इसका संयोग। इसे संतान षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। स्कंदपुराण के नारद-नारायण संवाद में संतान प्राप्ति और संतान से जुड़ी पीड़ाओं को दूर करने वाले इस व्रत का विधान बताया गया है। इस तिथि पर एक दिन उपवास करके कुमार कार्तिकेय की पूजा की जाती है। यह तिथि भगवान स्कन्द को समर्पित हैं। स्कन्द षष्ठी को कन्द षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है।
शिव पुत्र कार्तिकेय की पूजा
स्कन्द षष्ठी के व्रत में शिव पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय का पूजन किया जाता है। कहते हैं कार्तिकेय के पूजन से रोग, राग, दु:ख और दरिद्रता का निवारण होता है। स्कन्द षष्ठी पूजा की परम्परा काफी प्राचीन है। इन कथाओं के अनुसार भगवान शिव के तेज से उत्पन्न छह मुख वाले बालक स्कन्द की छह कृतिकाओं ने स्तनपान करा कर रक्षा की थी, इसीलिए कार्तिकेय नाम से पुकारा जाने लगा। पुराण व उपनिषद में इनकी महिमा का उल्लेख मिलता है।
स्कंद षष्ठी का महात्म्प
इस दिन पूजे जाने वाले भगवान स्कंद शक्ति के देव हैं, देवताओं ने इन्हें अपना सेनापती बनाया था। मयूर की सवारी करने वाले कुमार कार्तिक की पूजा मुख्य रूप से दक्षिण भारत मे होती है। दक्षिण में यह मुरुगन नाम से प्रसिद्घ हैं। स्कन्दपुराण के मूल में कुमार कार्तिकेय ही हैं तथा यह पुराण सभी पुराणों में सबसे बड़ा माना जाता है। स्कंद भगवान हिंदू धर्म के प्रमुख देवों मे से एक हैं। स्कंद को कार्तिकेय और मुरुगन नामों से भी पुकारा जाता है। दक्षिण भारत में पूजे जाने वाले प्रमुख देवताओं में से एक भगवान कार्तिकेय शिव पार्वती के पुत्र है। कार्तिकेय भगवान के अधिकतर भक्त तमिल हिन्दू हैं, इसीलिए इनकी पूजा रूप से भारत के तमिलनाडु में विशेष तौर पर होती है।
भगवान स्कंद का सबसे प्रसिद्ध मंदिर भी तमिलनाडु में ही है।
पौराणिक कथा
ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि स्कंद षष्ठी के कारण प्रियव्रत का मृत शिशु जीवित हो गया था। ऐसा माना जाता है कि भगवान शंकर के तेज से पैदा हुए स्कंद को 6 कृतिकाओं ने अपना दूध पिला कर पाला था। साथ ही स्कंद की उत्पत्ति अमावस्या की अग्नि से हुई थी। दक्षिण भारत में स्कंद मुरूगन के नाम से प्रसिद्ध हैं। स्कंदपुराण के उपदेष्टा कार्तिकेय हैं। यह पुराण और पुराणों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। कार्तिकेय को देवताओं ने सेनापति बनाया था और उन्होंने तारकासुर का वध किया था।
व्रत करने पर करें परहेज
इस व्रत को करने वाले भक्त को अहंकार, काम और क्रोध से मुक्ति मिलती है। जो भी साधक इस दिन उपवास रखकर पूजा करता है उसे मांस, शराब, लहसुन और प्याज का सेवन नहीं करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस भोग पदार्थों के सेवन से तामसिक प्रवृत्ति जागृति हो जाती है जो उपासक के विवेक को नष्ट कर देता है। ऐसी मान्यता है कि स्कंद षष्ठी के पूजन से च्यवन ऋषि को आंखी में रोशनी मिली थी।
इस दिन होता है शुभ मुहूर्त
हिन्दू पंचाग के अनुसार स्कंद षष्ठी का दिन खास होता है। इस दिन अच्छा मुहूर्त होने के कारण आप किसी भी नए काम की शुरूआत कर सकते हैं। इसके अलावा नया वाहन खरीदना हो या किसी व्यवसाय की शुरूआत करनी हो सभी कामों के लिए यह दिन लाभदायी सिद्ध होता है।


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