सौभाग्यवती स्त्रियां पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की करेंगी कामना

शनिवार, 1 जून से वट व्रत प्रारंभ हो गया है। ऐसे में ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक 3 दिनों तक महिलाएं व्रत-उपवास रखकर वटवृक्ष का पूजन करती हैं। ज्येष्ठ मास के व्रतों में वट अमावस्या का व्रत बहुत प्रभावी माना जाता है जिसमें सौभाग्यवती स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु एवं सभी प्रकार की सुख-समृद्धियों की कामना करती हैं। ऐसे में इस दिन स्त्रियां व्रत रखकर वटवृक्ष के पास पहुंचकर धूप-दीप व नैवेद्य से पूजा करती हैं और रोली और अक्षत चढ़ाकर वटवृक्ष पर कलावा बांधती हैं।
वट सावित्री का महत्व
पांच वटों से युक्त स्थान को पंचवटी कहा गया है। कहते हैं कि कुंभजमुनी के परामर्श भगवान श्री राम ने सीता एवं लक्ष्मण के साथ वनवास काल में यहां निवास किया था। मान्यता है कि वटवृक्ष के मूल में भगवान ब्रह्मा, मध्य में भगवान विष्णु और अग्रभाग में शिव रहते हैं। इसीलिए वट वृक्ष को देव वृक्ष कहा गया है। देवी सावित्री भी वट वृक्ष में प्रतिष्ठित रहती हैं। इसी अक्षय वट के पत्र पर प्रलय के अंतिम चरण में भगवान ने बाल रूप में मार्कंडेय ऋषि को प्रथम दर्शन दिया था। प्रयागराज में गंगा के तट पर वेणीमाधव के निकट अक्षय वट प्रतिष्ठित है। भक्त शिरोमणि तुलसीदास ने संगम स्थित अक्षय वट को तीर्थराज का छत्र कहा है। इसी प्रकार पंचवटी का भी विशेष महत्व है। वटवृक्ष की औषधि के रूप में उपयोगिता से लगभग सभी परिचित हैं। जैसे वटवृक्ष दीर्घकाल तक अक्षय बना रहता है, उसी प्रकार दीर्घायु अक्षय सौभाग्य तथा निरंतर विजय की प्राप्ति के लिए वट वृक्ष की आराधना की जाती है। इसी वटवृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने मृत पति को पुन: जीवित किया था। तब से यह व्रत वट सावित्री के नाम से किया जाता है।प्रत्येक मास के व्रतों में वट सावित्री व्रत एक प्रभावी व्रत है। इसमें वट वृक्ष की पूजा की जाती है। महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य एवं कल्याण के लिए यह व्रत करती हैं। सौभाग्यवती महिलाएं श्रद्धा के साथ जेष्ठ कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक 3 दिनों का उपवास रखती हैं।
वट सावित्री व्रत की कथा
कहते हैं कि साल्व देश पूर्वी राजस्थान या अलवर अंचल के इर्द-गिर्द था। सत्यवान अल्पायु थे। वे वेद ज्ञाता थे। नारद मुनि ने सावित्री से मिलकर सत्यवान से विवाह न करने की सलाह दी थी परंतु सावित्री ने सत्यवान से ही विवाह रचाया। सत्यवान व सावित्री के विवाह के कुछ समय बीत जाने के बाद जिस दिन सत्यवान की मृत्यु की तिथि नजदीक आने लगी, तो सावित्री एक-एक दिन गिनती रहती थी। नारदजी के वचन सावित्री को सदा ही याद रहते। जब उसने देखा कि अब इन्हें चौथे दिन मरना है। उसने तीन दिन तक व्रत धारण किया। जब सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गया तो सावित्री ने उससे कहा कि मैं भी साथ चलुंगी। तब सत्यवान ने सावित्री से कहा तुम व्रत के कारण कमजोर हो रही हो। जंगल का रास्ता बहुत कठिन और परेशानियों भरा है। लेकिन सावित्री नहीं मानी उसने जिद पकड़ ली और सत्यवान के साथ जंगल की ओर चल दी । सत्यवान जब लकड़ी काटने लगा तो एकदम उसकी तबीयत खराब होने लगी तब वह सावित्री से बोला मेरी तबियत खराब हो रही है अब मैं बैठ भी नहीं सकता हू तब सावित्री ने सत्यवान का सिर अपनी गोद में रख लिया। फिर वह नारदजी की बात स्मरण कर मन ही माह दिन व समय का विचार करने लगी। तभी हाथ में पाश लिए यमराज दिखे। सावित्री ने पूछा आप कौन है तब यमराज ने कहा मैं यमराज हूं। इसके बाद यमराज ने सत्यवान के शरीर में से प्राण निकालकर उसे पाश में बांधकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिए। सावित्री बोली मेरे पतिदेव को जहां भी ले जाओगे, मैं भी वहां जाऊंगी। तब यमराज ने उसे समझाते हुए कहा मैं उसके प्राण नहीं वापस नहीं लौटा सकता हूं पतिव्रता स्त्री होने के कारण मुझसे मनचाहा वर मांग लो। सावित्री ने वरदान में अपने ससुर की आंखे मांग ली। यमराज ने कहा तथास्तु। उसके बाद भी सावित्री उनके पीछे-पीछे चलने लगी। तब यमराज ने उसे फिर समझाया और वर मांगने को कहा उसने दूसरा वर मांगा कि मेरे ससुर को उनका पूरा राज्य वापस मिल जाए। उसके बाद तीसरा वर मांगा मेरे पिता जिन्हें कोई पुत्र नहीं हैं उन्हें सौ पुत्र हों। यमराज कहा तथास्तु। फिर सावित्री उनके पीछे-पीछे चलने लगी यमराज ने कहा सावित्री तुम वापस लौट जाओ चाहो तो मुझसे कोई और वर मांग लो। तब सावित्री ने कहा मुझे सत्यवान से सौ यशस्वी पुत्र हों। यमराज ने कहा तथास्तु। यमराज फिर सत्यवान के प्राणों को अपने पाश में जकड़े आगे बढऩे लगे। सावित्री ने फिर भी हार नहीं मानी तब यमराज ने कहा तुम वापस लौट जाओ तब सावित्री ने कहा मैं कैसे वापस लौट जाऊं। आपने ही मुझे सत्यवान से सौ यशस्वी पुत्र उत्पन्न करने का आशीर्वाद दिया है। तब यमराज ने सत्यवान के प्राण वापस लौटा दिए और जीवित कर दिए। उसके बाद सावित्री जब सत्यवान के शव के पास पहुंची तो कुछ ही देर में सत्यवान के शव में चेतना आ गई और सत्यवान जीवित हो गया उसके बाद सावित्री ने पति को पानी पिलाकर अपना व्रत तोड़ा।


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