Subhash Chandra Bose Jayanti : सुभाष चंद्र बोस ने बनाई थी आजाद सरकार, खुद बने थे पहले प्रधानमंत्री

नई दिल्ली: आज (23 जनवरी) स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) उर्फ नेताजी की जयंती है. अगर आपसे कोई पूछे कि भारत के पहले प्रधानमंत्री का नाम क्या था? तो आप यही कहेंगे कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे. भारत के छोटे से छोटे स्कूल और बड़ी से बड़ी यूनिवर्सिटी के छात्र यही जवाब देंगे क्योंकि बचपन से ही भारत में स्कूल की किताबों में यही इतिहास पढ़ाया गया है. लेकिन ये बात पूरी तरह सच नहीं है.

सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) ने बनाई थी पहली आजाद सरकार
सच ये है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू से भी पहले, भारत की पहली आजाद सरकार के, पहले प्रधानमंत्री, नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) थे. शायद आपको इस बात पर यकीन नहीं हो रहा होगा. लेकिन इसमें आपकी कोई गलती नहीं है. आजाद भारत में सरकारों ने कुछ खास किस्म के इतिहासकारों को ही मान्यता दी. इन इतिहासकारों ने भारत के इतिहास से जुड़ी बहुतों महत्वपूर्ण घटनाओं को आपसे छुपा लिया. सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) भारत की पहली आजाद सरकार के प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री थे. लेकिन ये बात कभी आपको बताई ही नहीं गई.

मोदी सरकार ने आजाद सरकार को दी मान्यता
मोदी सरकार साल 2017 में 21 अक्टूबर को भारत की पहली आजाद सरकार की 75वीं वर्षगांठ मनाई थी. इस सरकार को ‘आजाद हिंद सरकार’ कहा जाता है. ये सरकार 21 अक्टूबर 1943 को बनी थी.

इसका अर्थ ये है कि भारत सरकार ने सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) द्वारा स्थापित आजाद हिंद सरकार को मान्यता दे दी है. इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले का दौरा किया था और वहां आजाद हिंद फौज़ संग्रहालय का उद्घाटन किया था.

इसके अलावा 30 दिसंबर 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंडमान निकोबार गए थे. क्योंकि करीब 77 साल पहले, 30 दिसंबर 1943 को ही अंडमान निकोबार में पहली बार सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) ने तिरंगा फहराया था. ये तिरंगा आजाद हिंद फौज का था. और ये भारतीय जमीन पर आजादी की पहली निशानी थी.

दूसरे विश्व युद्ध उतरी थी आजाद सरकार
भारत की पहली आजाद सरकार की स्थापना और उसकी घोषणा सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) ने 21 अक्टूबर 1943 को की थी. इस घोषणा के तुरंत बाद ही 23 अक्टूबर 1943 को आजाद हिंद सरकार दूसरे विश्व युद्ध के मैदान में उतर गई थी. आजाद हिंद सरकार के प्रधानमंत्री नेता जी सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) ने ब्रिटेन और अमेरिका के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया था.

9 देशों ने दी थी आजाद सरकार को मान्यता
उस वक्त 9 देशों की सरकारों ने सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) की सरकार को अपनी मान्यता दी थी. जापान ने 23 अक्टूबर 1943 को आजाद हिंद सरकार को मान्यता दी. उसके बाद जर्मनी, फिलीपींस, थाईलैंड, मंचूरिया, और क्रोएशिया ने भी आजाद हिंद सरकार को अपनी मान्यता दे दी. आजाद हिंद सरकार ने जापान सरकार के साथ मिलकर म्यांमार के रास्ते पूर्वोत्तर भारत में प्रवेश करने की योजना बनाई थी. सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) ने बर्मा की राजधानी रंगून को अपना हेडक्वार्टर बनाया, तब वहां जापान का कब्ज़ा था. 18 मार्च 1944 को सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) की आजाद हिंद फौज ने भारत की धरती पर कदम रखा था. और उस जगह को अब नागालैंड की राजधानी कोहिमा के नाम से जाना जाता है.

आजाद सरकार में प्रधानमंत्री थे सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose)
आजाद हिंद फौज के शौर्य में कोई कमी नहीं थी. लेकिन दो प्रमुख वजहों से सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) की आजाद हिंद फौज कोहिमा से आगे नहीं बढ़ सकी. पहली वजह ये है कि ये युद्ध जंगलों में लड़ा जा रहा था. तब जुलाई का महीना था और भारी बारिश की वजह से सेना का आगे बढ़ना मुश्किल था. दूसरी बड़ी वजह ये थी कि आजाद हिंद फौज के पास Air Support नहीं था. ब्रिटिश सेना के पास लड़ाकू विमान थे, जिनके सामने आजाद हिंद फौज के सैनिक मजबूर थे.

सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose), आजाद हिंद सरकार के पहले प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री थे. लेफ्टिनेंट कर्नल ए सी चटर्जी आजाद हिंद सरकार के वित्त मंत्री थे. एस ए अय्यर आजाद हिंद सरकार के प्रचार मंत्री थे. रास बिहारी बोस को आजाद हिंद सरकार का सलाहकार बनाया गया था. इस सरकार की स्थापना करते वक्त नेता जी सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) ने ये शपथ ली थी कि ‘ईश्वर के नाम पर मैं ये पवित्र शपथ लेता हूं कि भारत और उसके 38 करोड़ लोगों को आजाद करवाऊंगा’.

आजाद सरकार ने तिरंगा को तय किया था राष्ट्रीय ध्वज
आजाद हिंद सरकार ने ये तय किया था कि तिरंगा झंडा, भारत का राष्ट्रीय ध्वज होगा. विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार रवींद्र नाथ टैगोर का जन-गण-मन भारत का राष्ट्रगान होगा. और लोग एक दूसरे से अभिवादन के लिए जय हिंद का प्रयोग करेंगे.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) की कथित मौत के बाद भी ब्रिटेन और अमेरिका की खुफिया एजेंसियां पूरी दुनिया में उनकी तलाश करती रहीं. ये वो दौर था जब अहिंसा के पुजारियों पर लाठियां बरसाना, अंग्रेज़ों का बहुत प्रिय शौक था. लेकिन सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) ने खून का बदला खून से लेने की नीति पर काम किया.

नेताजी को आज तक नहीं मिला भारत रत्न
ये सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) द्वारा छेड़ा गया रक्त रंजित संग्राम था, जिसमें अंग्रेज़ों की सेना के 45 हज़ार से ज़्यादा सैनिकों की मौत हुई थी. बर्मा की जंग में अंग्रेज़ों की सेना सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) के चक्रव्यूह में इस तरह फंसी थी कि ब्रिटिश सेना के 10 हज़ार से ज़्यादा सैनिक बीमारियों का शिकार हो गए थे. इस लड़ाई में अमेरिका की सेना के भी 3 हज़ार से ज़्यादा सैनिकों की मौत हुई थी.

लेकिन ये बहुत दुख की बात है कि आज भी सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) को वो सम्मान नहीं दिया गया जिसके वो हकदार थे. ये बड़े आश्चर्य की बात है कि हमारे देश के कुछ नेताओं ने अपने जीते जी अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान ही खुद को भारत रत्न से सम्मानित कर लिया. लेकिन नेता जी सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) को आज तक भारत रत्न नहीं दिया गया. पंडित जवाहर लाल नेहरू को वर्ष 1955 में भारत रत्न दिया गया था और तब वो भारत के प्रधानमंत्री थे. इंदिरा गांधी को वर्ष 1971 में भारत रत्न दिया गया था और वो भी उस दौरान भारत की प्रधानमंत्री थीं. मृत्यु के तुरंत बाद राजीव गांधी को भी भारत रत्न दिया गया. लेकिन आज तक ये सम्मान सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) को नहीं मिला.


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