जमाली कमाली मस्जिद और मकबरा

दिल्ली के पुरातात्विक गाव परिसर में दो प्राचीन स्मारक है, ये दोनों ही स्मारक एक, दूसरे के निकट मौजूद है। इन दोनों स्मारकों में से एक मस्जिद है और दूसरा दो व्यक्ति जमाली और कमाली के मकबरे हैं जिनमे उनकी कब्रे है। जमाली एक उर्दू शब्द है जो शब्द जमाल से बना है, जमाल शब्द का अर्थ होता सुंदरता।
जमाली उर्फ शेख फजलुल्लाह, जिन्हे शेख जमाली कम्बोह व जलाल खान के नाम से भी जाना जाता है, एक प्रसिद्ध सूफी संत थे जिन्होंने अपना जीवन पूर्व मुगल वंश के लेडी साम्राज्य के दौरान व्यतीत किया था। सिकंदर लोधी के शासन काल से लेकर मुगल शासक बाबर और हुमायूँ के शासन काल की अवधि को लेडी साम्राज्य के नाम से जाना जाता है। जमाली का सभी व्यक्ति बहुत आदर करते थे। कमाली एक अज्ञात व्यक्ति था लेकिन वो जमाली का सम्बन्धी था और उनका पूर्ववृत्त स्थापित नहीं हो पाया था। उन दोनों के नाम को एक साथ चिह्नित कर जमाली कमाली दिया गया और उनके नाम पर एक मस्जिद और दोनों के मकबरे बनाये गए जहा इन दोनों की कब्रो को एक दूसरे के निकट दफनाया गया। इन मस्जिद और मकबरे का निर्माण सं 1528-1529 के बीच करवाया गया था और सं 1535 में जमाली की मृत्यु के पश्चात उन्हें इस मकबरे में दफनाया गया।
जमाली कमाली की मस्जिद, एक संलग्न उद्यान क्षेत्र में स्थित है। इस मस्जिद को सं 1528-29 के दौरान बनाया गया था, जिसमे दक्षिण द्वारा प्रवेश किया जाता है। इस मस्जिद का निर्माण करने में लाल बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है और साथ ही संगमरमर द्वारा अलंकृत भी किया गया है। इस मस्जिद को भारत में मुगल मस्जिद की वास्तुकला के नमूने का अग्रदूत भी मन जाता है। मस्जिद का प्रार्थना घर एक बड़े आँगन की सन्मुख है, जिसमे पांच मेहराब है और केंद्रीय मेहराब में एक बड़ा गुबंद भी शामिल है। मेहराबों का आकार केंद्रीय मेहराब के आकार को बढ़ाता है, केंद्रीय मेहराब इन पांचो मेहराबों से सबसे बड़ी है जिसे बेहद खूबसूरत अलंकरण से अलंकृत किया गया है। मेहराबों के चाप को प्राचीन तमगों और अलंकरणो से सजाया गया है।
खांचे के आयतकार स्तंभ केंद्रीय मेहराब की शोभा को बढ़ाते है। पश्चिम की प्रार्थना दीवार में मेहराब के साथ आले है। मस्जिद के प्रार्थना ग्रह के आलो और दीवारो पर कुरान के कुछ लेखो का शिलालेख किया गया है। मस्जिद के चारो और बना बरामदा दो मंजिला मस्जिद तक पहुंचने का मार्ग प्रदान करता है और मस्जिद के चारो कोने अष्टकोणीय मीनारों से सजे है। मस्जिद के पिछले भाग के छोर को केंद्रीय मेहराब की छोटी खिड़की को छोड़कर, गड़ी हुई खिड़कियों सुरक्षा प्रदान करती है।

जमाली कमाली का मकबरा एक 7.6 द्व (25 द्घह्ल) वर्गाकार संरचना है जिसे सपाट छत के साथ बनाया गया है। ये मकबरा मस्जिद के उत्तरी दिशा के निकट स्थित है। कक्ष के भीतर की सपाट छत को चिपकनेवाली पट्टी से बनाया और सुशोभनाता से अलंकृत किया गया है। इस कक्ष को लाल और नील रंग से रंगा गया है और साथ ही उसपर कुरान की कुछ आयतों का भी उल्लेख किया गया है। मकबरे की कक्ष की दीवारो पर रंगीन टाइल्स लगायी गयी है जिनपर जमाली की कविताओं को लिखा गया है। मकबरे की सजावट को एक गहने की पेटी में घुसने की धारणा से की गयी है। जमाली कमाली मस्जिद और मकबरे, के समाधि कक्ष में संगमरमर से बानी दो कब्रे है : एक जमाली की, जो एक संत व् कवि थे और दूसरी कमाली की।

जमाली, एक कवि
जमाली, एक सुन्नी व्यापारी के परिवार के सदस्य थे, इन्हे शेख़ शम्सुद्दीन द्वारा सूफी धर्म में यकीन दिलाया गया था। वे एक प्रसिद्ध व् लोकप्रिय कवि थे जिन्होंने व्यापक रूप से एशिया और मध्य पूर्व के चारों ओर यात्रायें की थी। लोधी वंश के दौरान वे दरबारी कवि बन गए थे और मुगल साम्राज्य के बाबर और उनके पुत्र हुमायूँ के संरक्षण में रह कर दरबारी कवि ही बने रहे।
उनकी कविताओं में उस समय के फारसी रहस्यवाद नफर आते थे। उन्हें दो तरह के कार्यो में बहुत दिलचस्पी थी जिनमे से एक सूर्य और चंद्रमा और दूसरा फकीरों की आध्यात्मिक यात्रा था। इनके मकबरे का निर्माण हुमायूँ के शासन काल के दौरान ही सम्पूर्ण हो गया था।

मस्जिद और मकबरे का संरक्षण
इन स्मारकों का निर्माण बहुत ही बेहतर तरीके से किया गया है और यह बहुत ही शांत वातावरण प्रदान करता है। इन स्मारकों का संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा किया जाता है। यह उन 172 स्मारकों में से एक है जिनकी मरमत्त का अधिकार ्रस्ढ्ढ द्वारा दिल्ली पुरातत्व चक्र को दिया गया है। इस स्मारक की मरमत्त करने के लिए लगभग 1.5 मिलियन रूपए प्रस्तावित किये गए है।

कैसे पहुंचे :
महरौली के शहरी नगर में स्थित इस स्मारक तक दिल्ली के किसी भी स्थान और यातायात साधन, रोड द्वारा पंहुचा का सकता है। ये स्थान दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से मात्र 18 द्मद्व की दुरी पर है, जबकि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से इसकी दुरी 17 किलोमीटर (11 मील) है। जमाली कमाली मस्जिद और मकबरे का स्थान निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से 16 किमी (9.9 मील) की दुरी पर स्थित है। पर्यटक सप्ताह की किसी भी दिन इस स्मारक को देखने आ सकते है।

छ्वड्डद्वड्डद्यद्ब ्यड्डद्वद्यद्ब 8महत्त्वपूर्ण जानकारी :
जमाली कमाली मस्जिद और मकबरे में हफ्ते की किसी भी दिन प्रवेश किया जा सकता है। यहाँ तक पहुंचने का सबसे सुलभ मार्ग मेट्रो –ग्रीन पार्क स्टेशन – ऑटो/रिक्शा/पैदल है, दिल्ली के सभी क्षेत्रो में मेट्रो सुविधा उपलब्ध है। इस स्मारक में आप सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक प्रवेश कर सकते है। आपको बता दे ये स्मारक मंगलवार के दिन बंद रहती है। यहाँ प्रवेश करने के लिए आपको किसी भी तरह का शुल्क नहीं देना होता है।

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दिल्ली की भूतिया जगहों में शुमार, जमाली कमाली का रोचक भरा इतिहास
अगर आप दिल्ली में कुछ नया और ऐतिहासिक देखना चाहते है तो जमाली कमाली मस्जिद अच्छा विकल्प हो सकता है। दरअसल यह दिल्ली की उन ऐतिहासिक इमारतों में शामिल है जिन्हें हम और आप मुगल शासन के तौर पर जानते है। यह मस्जिद दिल्ली के महरौली मार्ग पर स्थित है।

बता दें यहां पर 16वीं शताब्दी के सूफी संत जमाली और कमाली की कब्र मौजूद है। यह प्रमुख कब्रे संगमरमर की बनी हैं इनमें से एक कब्र जमाली की और दूसरी कमाली की है। मस्जिद लाल पत्थर और संगमरमर से बनाई गई है। सूफी संत जमाली लोधी हुकूमत के राज कवि थे। इतिहासकारों के मुताबिक बाबर और उनके बेटे हुमायूं के राज तक जमाली को काफी महत्व दिया जाता था।

कौन थे जमाली
जमाली का असली नाम शेख फेजलुल्लाह था जिन्हें महान सूफ़ी संत के रुप में जाना जाता था। जमाली अपने दौर के प्रख्यात कवि थे। इतिहासकारों की मानें तो अपनी एक यात्रा के दौरान वह दिल्ली आए थे जहां लोधी वंश के शासनकाल में वह कवि बनकर रहने लगे। वह बाबर और हुमायूं के दरबारी कवि भी हुआ करते थे।
शेख़ फेज़लुल्लाह को ज़माली नाम उनकी लोकप्रिय कविताओं की वजह से ही मिला था। इसी नाम से जमाली कमाली मस्जिद की स्थापना की गई। मस्जिद में दो कब्र स्थापित है एक जमाली की और दूसरी कमाली की, ऐतिहास के पन्नों में केवल जमाली का जिक्र किया गया है। कमाली कौन थे क्या उनका इतिहास रहा इस बात की जानकारी उपलब्ध नहीं है।

जमाली कमाली मस्जिद का इतिहास
यह मस्जिद सूफी संत जमाली की मृत्यु के बाद बनाई गई थी । इस लोधी वंश के दौरान सन् 1528 से लेकर 1529 के बीच तैयार किया गया है। मस्जिद में दो कब्रे स्थापित की गई है जिन पर जमाली और कमाली लिखा गया है। जमाली की जानकारी ऐतिहासिक दस्तावेजो में उल्लेखित है लेकिन कमाली का कोई वर्णन नहीं किया गया है। मस्जिद में अन्य कब्रे भी है उनकी जानकारी नहीं दी गई है।

जमाली कमाली मस्जिद बनावट और स्वरुप
मस्जिद ऐतिहासिकता की नीव़ रखते हुए काफी विशाल है। इसके आंगन की बात की जाएं तो यह काफी बड़ा है। ऊंचे ऊंचे गुम्बंद इसे काफी रोचक बनाने का काम करती है। यह मुगल शासन की अद्भुत वास्तुकला का खूबसूरत उदाहरण है। मस्जिद में नक्काशीदार मूर्तियां, खिड़कियां और दीवारों पर शाही सौंदर्य का सुंदर चित्रण किया गया है।
इसकी छत पर भी कई कलाकृति आपका मन मोह लेगी। दीवारों पर पेड़ पौधों की कलात्मक शैली का प्रयोग किया गया है। बाहर स्थित आंगन में खूबसूरत रंगोली बनी हुई है जो वर्तमान समय में धूमिल हो चुकी है। दीवार की रंगाई सफेद रंग से की गई है। जमाली कमाली के मकबरे में 12 कब्र बनीं हुई है इसके अलावा भी कई कब्रे है लेकिन यह सभी कब्रे अज्ञात श्रेणी में आती है।

भूतिया जगहों शामिल जमाली कमाली मस्जिद
कुछ समय से इस मस्जिद को लेकर कई बातें सामने आई है। अग्रसेन की बावली, खूनी दरवाज़ा और सलीमगढ़ किले के बाद इस मस्जिद को लोगों द्वारा भूतिया कहा जाने लगा है। भूतिया अड्डो में शामिल जमाली कमाली मस्जिद के बड़े से आंगन में सुबह से लेकर शाम तक स्थानीय बच्चे खेलते है।
लेकिन रात होते ही यहां कोई नहीं रुकता स्थानीय लोग से इसे भूतिया अड्डा मानते है जहां रात होते ही जिन्न की टोली लग जाती है। कुछ लोगों ने यहां रहस्यमयी आवाज़े सुनी है तो कुछ यहां अदृश्य रुह होने की बात कहते है।
कहां है स्थित जमाली कमाली मस्जिद
दिल्ली के महरौली मार्ग से कुछ ही दूरी पर स्थित जमाली कमाली मस्जिद देखने में आपको रोचक लगेगी। यहां एक पार्क भी स्थित है। यहां पहुंचने के लिए आपको ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। बस, ऑटो, बाइक, कार और मेट्रो से आप यहां आसानी से पहुंच सकते है। इसके आसपास कई ऐतिहासिक धरोहर है जैसे- आदम खान का मकबरा, अहिंसा स्थल और कुतुब मिनार।


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