डियर जिंदगी : छोटे-छोटे लेकिन ‘बड़े’ काम

हमने मनुष्‍य, मनुष्‍यता को बड़ी भारी-भरकम बातों में उलझा दिया है. इसका नुकसान यह हुआ कि हम अपनी जिंदगी में बस बड़ी-बड़ी बातें ही करते रहते हैं. गिले-शिकवे और शिकायतों मे उलझे रहते हैं. हम बहसों में डूबे रहें, इसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन हम अपने आसपास से आंखें मूंदे, मुंह बंद किए चलते, रेंगते रहें, इससे तो समाज कुछ नहीं बदलने वाला. परिवर्तन को सबसे पहले खुद के भीतर से गुजारना होता है. उसके बाद वह आपके शब्‍दों पर सवार होकर सफर करता है. जिस चीज को आपने दिल से स्‍वीकार नहीं किया है, उसका असर होना संभव नहीं. लेकिन हम इसका उल्‍टा ही किए और जिए जा रहे हैं.

हम रास्‍ते में पड़े घायल के लिए गाड़ी नहीं रोकते. गर्मी में कार में पानी की कई बोतलें होते हुए भी रास्‍ते में सूखते होंठों को देखकर कभी ख्‍याल नहीं आता कि कुछ उनके हल्‍क में भी चला जाए. हम खाने के लिए इन दिनों इतना खरीदते हैं कि खाते-खाते फेफड़े हांफने लगें, आंते हाथ जोड़ लेती हैं तब कहीं जाकर खाना बंद करते हैं, बचा हुआ खाना विरक्‍त भाव से डस्‍टबीन की ओर सरका देते हैं, लेकिन किसी भूखे के लिए सलीके से बचा नहीं सकते. उसे दे नहीं सकते.

 

इसकी जड़ में एक ही केंद्रीय विचार है. सबकुछ अपने लिए! आखिर यह मैंने हासिल किया है. अरे! भाई हासिल करने का यह अर्थ तो नहीं कि दुनिया की ओर से मुंह मोड़ लिया जाए. हम भूल रहे हैं कि हमारे होने में न जाने किस-किस की भूमिका है. न जाने कितने लोग साथ देते हैं, तब यह पेड़ सुरक्षित बड़ा हो पाता है. वरना अनेक अच्‍छे भले, स्‍वस्‍थ पौधे मुरक्षा जाते हैं. उनका सफर अचानक से पटरी से उतर जाता है. ऐसा इसलिए होता है, क्‍योंकि हम उनसे हवा को साफ करने की अपेक्षा तो रखते हैं, लेकिन अपनी भूमिका भूल जाते हैं.

हम अपने आसपास भूखे, नंगे और बेसहारा लोगों को जब तक यूं ही उनके हाल पर छोड़ते रहेंगे तब तक हम बढ़ते अपराध और असामाजिकता पर नियंत्रण नहीं लगा सकते. हमें सबसे पहले खुद को दूसरों के लिए संवेदनशील करना होगा, थोड़ा-थोड़ा बदलना होगा, तभी हम अपने आसपास कुछ बदल पाएंगे. नहीं तो हमारी बातें बस उपदेश बनकर रह जाएंगी और उपदेश से कुछ नहीं बदलता.

 

आइए, अपने आसपास हो रहे कुछ छोटे-छोटे, लेकिन जरूर प्रयासों पर नजर डालें. और सोचें कि क्‍या हम इतना भी नहीं कर सकते. इतना तो किया ही जा सकता है…

अपनी कॉलोनी में जाते हुए मैंने देखा कि गेट के ठीक बाहर गार्ड रूम के पास एक कार रुकती है. उसमें से कुछ मटके निकाले जाते हैं, उतना बड़ा जितना एक कार में लेकर आना संभव है. कार गुजरने के बाद मैंने गार्ड से पूछा यह किससे लिए हैं. उसने कहा, कॉलोनी के ही एक सज्‍जन हैं. कल उनसे कहा था कि गर्मी बढ़ गई है, लेकिन पानी रखने के लिए कुछ नहीं है. जिसने यह सोचा उसने चुपचाप कर दिया. एक दिन एक रेस्‍तरां में कुछ खाते हुए मैंने देखा एक बुजुर्ग बार-बार अपने बच्‍चों से कह रहे थे, जितना चाहिए उतना ही लेना. लेकिन बच्‍चे कहां मानते हैं, खूब सारा ऑर्डर हुआ. बच गया और ऐसे बचा कि दूसरे को देने लायक भी नहीं था. उसने खाने का बिल देने से इनकार कर दिया. बच्‍चों के काफी जिरह के बाद भी उनने बिल नहीं दिया.

 

बच्‍चों ने किसी तरह आपस में चंदा करके बिल दिया. उसके बाद बुजुर्ग ने जितना बिल था, उतने का खाना फिर से ऑर्डर किया और खाना बाहर उन बच्‍चों में बांट दिया, जो कार धोने जैसे काम करके किसी तरह पेट पालते हैं. एक मल्‍टीप्‍लेक्‍स के बाहर एक लेखक अपने बच्‍चों के साथ टहल रहे थे कि एक बच्‍ची उनके पास आकर गुलाब खरीदने का आग्रह करने लगी. वह गुलाब नहीं लेना चाहते थे, लेकिन उस बच्‍ची की मदद करने के लिए उनने पैसे दे दिए, लेकिन गुलाब लेने से मना कर दिया.

उधर बच्‍ची का स्‍वाभिमान देखिए उसने बिना गुलाब दिए, पैसे लेने से इनकार कर दिया. उनने गुलाब लिया और रात-दिन मॉल की सुरक्षा में तैनात गार्ड को दे दिया. यह कहते हुए कि आपके कारण हम सब सुरक्षित हैं. गार्ड की आंखें भर आई. वह कुछ कह ही नहीं पाया. लेकिन एक छोटे से काम से एक साथ तीन लोगों में उन कोमल भावनाओं का संचार हो गया, जो जिंदगी को उदार और स्‍नेहिल बनाते हैं. मैं एक ऐसे सज्जन को जानता हूं जो गर्मी में सड़क पर जिसे भी बेहाल देखते हैं, उसके लिए पानी, नींबू पानी या नारियल पानी में से कुछ न कुछ इंतजाम करने की कोशिश करते हैं. एक मित्र हैं, जिनका नियम हैं कि कभी किसी घायल से मुंह नहीं मोड़ते. भले ही कितना भी जरूरी काम क्‍यों न हो. वह कहते हैं किसी के जीवन से बड़ा कुछ नहीं. यह बस छोटी छोटी कोशिशें हैं, लेकिन हमें मनुष्‍य बनाए रखने की दिशा में बेहद जरूरी प्रयास हैं. कोशिश करिए कि आप भी इनका हिस्‍सा बन सकें. यह इतना मुश्किल भी नहीं.


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