ब्रहस्पति से जुड़े रहस्य बताता है देवगुरू पहाड़ी का यह अद्भूत मंदिर

ऐसा बताया जाता है की इंद्र को पराजित कर बृहस्पति ने उनसे गायो को छुवाया था। युद्ध में अजय रहने के कारण योद्धा लोग इनकी प्रार्थना करते थे। इन्हे गुहपुरोहित भी कहा गया है। इनके बिना यज्ञ सफल नहीं होता इनकी कृपा से धन -समृद्धि पुत्र और शिक्षा की प्राप्ति होती है , पीला रंग और पिली वस्तुएं इनको बहुत प्रिय है। बृहस्पतिवार के दिन पीले वस्त्र पहनने ,पीली वस्तुओ का दान करने और घर पर पीले पकवान बनाने से यह बहुत प्रसन्न होते है बृहस्पतिवार के दिन इनका उपवास रखने और पीले वस्त्र पहनकर , केले के वृक्ष को पीले रंग की वस्तु अर्पित करके पूजन करना चाहिए। उसके उपरांत कथा सुननी और आरती करे देवगुरु की पूजा से व्यक्ति के अंदर आध्यात्मिक भावना पैदा होती है।
उत्तराखंड के नैनीताल जिले के ओखलकांड क्षेत्र में देवगुरु चोटी के शिखर पर स्थित देवगुरु बृहस्पति के मंदिर के बारे में बताने जा रहे है देवगुरु ओखलकांड ब्लॉक में काठगोदाम से लगभग 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित देवगुरु नाम का गांव देश में बहुत गिने-चुने देवगुरु बृहस्पति के मंदिर के लिए जाना जाता है। यहाँ से दूर -दूर तक नयनभिराम हिम श्रंखलाएँ दृष्टिगोचर होती हैं। घने जंगलों के बीच स्थित इस मंदिर को देवगुरु बृहस्पति की तपस्थली माना जाता है। कहा जाता है कि यह स्थान आज भी देवगुरु के अलौकिक रहस्यों को प्रकट करता है। माना यह भी जाता है कि समूचे विश्व में देवगुरु को समर्पित यह एकमात्र मंदिर है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई आठ हजार फुट है। वैसे यह एक बड़ा मंदिर परिसर है, जिसमें बाराही देवी के दरबार समेत कई अन्य धार्मिक स्थल हैं। इस स्थान पर आकर देवगुरु बृहस्पति के ध्यान लगाने की कई कथाएं प्रचलित हैं, यहां पहुंचने के लिए सड़क रास्ते से काठगोदाम से धानाचूली, ओखलकांडा-करायत के रास्ते देवली पहुंचकर गुरु पर्वत के लिए चार किलोमीटर की पैदल चढ़ाई करनी होती है। आसपास के इलाकों में देवगुरु को ही आराध्यदेव के रूप में पूजा जाता है।


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