पह़ाडी पर सजा माँ विंध्यवासिनी का दरवार

बाड़ी । नवरात्रि में माता की उपसना कर देवताओं ने भी किया था मां का पूजनधार्मिक पुराणों के अनुसार मां का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए देवताओं ने भी नवरात्रि के 9 दिनों का उपवास रखा था। देवराज इंद्र ने राक्षस वृत्रासुर का वध करने के लिए मां दुर्गा की पूजा अर्चना और नवरात्रि व्रत रखे। यही नहीं भगवान शिव ने त्रिपासुर दैत्य का वध करने के लिए मां भगवती की पूजा अर्चना की। जगत के पालनहार भगवान विष्णु ने मधु नामक असुर का वध करने के लिए मां दुर्गा की पूजा अर्चना की। भगवान श्री राम ने भी रावण का वध करने के लिए मां दुर्गा की पूजा अर्चना की और नवरात्रि के व्रत किए। देवी मां के आशीर्वाद से ही भगवान राम को अमोघ वाण प्राप्त हुआ, जिससे वो रावण का वध कर पाएं। पांडवों ने भी विजय के लिए देवी मां की उपासना की थी।   

विंध्याचल पर्वत पर विराजमान विध्यवासिनी देवी ।  बैसे तो माता जी का इतिहास की पूर्ण जानकारी किसी के पास उपलब्ध नहीं हैं ..क्योंकि यह कभी बियाबान जंगल और हिंसक जानवरों का सामराज्य था , पहाड़ी पर माता जी पाषाण की मूर्ति थी जिसकी पूजा आदिवासी समुदाय करता था और यह खेड़ापति मानी जाती थी । बारना बाँध के निर्माण के बाद भोपाल मार्ग बजीरगंज से काट कर सिरवारा नागिन मोड़ होते हुए बगासपुर पर निकला .और उसी समय इन गाँवों की नींव रखी गई ..जानकर बताते हैं कि इस क्षेत्र में कभी भी किसी जानवर ने इंसान की जान नहीं ली और न ही इस रास्तें पर कोई ऐसा भीषण हादसा हुआ जिसमें किसी इंसान की जान गई हो ।जबकि सिंघोरी अभ्यारण्य में आज भी हिंसक शेर चीता व तेंदुआ की मौजूदगी हैं ..

स्वप्न आने पर लिया मंदिर बनाने का संकल्प।  सिरवारा में पोस्टमैन श्री कृपाराम नाथ निवास करते थे एक बार उन्हें स्वप्न में माता जी ने दर्शन दिया और कहा कि मूर्ख में तो तेरे पास हमेशा ही हूँ..और सपने में ही उन्होंने जगह बताई ..हालांकि आज के दौर में सपनों का कोई स्थान नहीं होता फिर भी उन्होंने उस स्थान को खोज किया जबकि सपने की बात धुंधली हो जाती लेकिन उन्हें बैसी ही प्रतिमा मिली और उन्होंने उस स्वप्न को सच माना और धीरे धीरे माताजी का घर बनाया जाने लगे ..आज उनके चार पुत्र भी लगन के साथ माताजी की सेवा में रहते । बुजुर्ग हो चुके कृपाराम जी मंदिर का जिम्मा संभाल रहे हैं ..उनके इस संकल्प में उनके ज्योष्ठ पुत्र राकेश नाथ ने भी अपना जीवन माताजी के चरणों में समर्पित कर दिया और एक समिति का गठन कर मंदिर को भव्यता प्रदान करने में लगे हैं ..

ऊपर होने से सामान की कीमत हो जाती तिगनी।  लगभग छह सो फिट ऊपर पहाड़ी पर रेत गिट्टी लोहा सिमेंट व अन्य सामाग्रियों को पहुँचाने में मजदूरों की व्यवस्था भी बड़ी मुश्किलों से होती हैं और उनकी मनमानी भी पूरी करनी पड़ती थी जिसकी पूर्ति मातारानी कहाँ से करती हैं यह तो बहीं जाने लेकिन आज विंध्यवासिनी धाम जंगल में मंगल जैसा लगता हैं । प्राकृतिक हरियाली व कुदरती सौंदर्य की छटा ही मन को अध्यात्म शाँति देती हैं । विंध्याचल पर्वत की सुरमई वादियों में बिराजमान माता जी के दरवार में आने पर मन को अध्यात्म शाँति मिलती हैं ..दरवार में पहुँचने के लिए नीचे से सीढियां बनी हैं और उसके साथ ही लोहे के पाइप की रैलिंग कदम दर कदम रोशनी आसपास वृक्षारोपण और आधे से अधिक सफर करने के बाद माताजी के द्वार के बाद वृक्षारोपण और लोहे की जालियां से पूरा परिसर सुरक्षित किया गया जिससे आने बाले श्रृंखलाओं व छोटे छोटे बच्चों को किसी प्रकार का कष्ट न हो । दरवार में शुध्द पेयजल थकान मिटाने के लिए सामुदायिक भवन फ्रेश होने के लिए लेटबाथरुम .व हाल ही में कार्यक्रम करने के लिए साठ बाय साठ में ओपान बरामदा बनकर तैयार हो गया..मंदिर समिति प्रमुख राकेश नाथ ने चर्चा में बताया कि अभी मंदिर में और भी बहुत कार्य होना शेष हैं जब माताजी की मर्जी होती हैं तभी काम शुरु हो जाता हैं ..इस निर्माण में सभी का भरपूर सहयोग और मातारानी की कृपा से ही संभव हो रहा हैं .जो शेष निर्माण कार्य करने हैं बह भी जब मातारानी चाहे तब हो जायेंगे।


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